एक चुटकी खैनी की कीमत आप क्या जानो सुशासन बाबू

राकेश कुमार:-बिहार लाईव न्यूज24

खैनी बिहार की आत्मा है, खैनी बिहार का संस्कार है। खैनी की पहचान बिहारी से है या बिहारी की पहचान खैनी से, इस निष्कर्ष तक पहुँचना बड़ी मुश्किल काम है। जिस तरह गले में आला लटकाए व्यक्ति एक डाक्टर की पहचान कराता है, उसी तरह कमर में खैनी का डिब्बा अटकाए व्यक्ति एक बिहारी की पहचान कराता है।आजकल किसी बिहारी को सर्च कर लीजिए….. उसके पास दो चीजें सामान्य रूप से मिल जाएगी….. उपर की जेब में मोबाइल और नीचे की जेब में खैनी का डिब्बा!

लोग फिल्मों में रजनीकांत के सिगरेट पीने के स्टाइल पर भले ही तालियाँ पीटते हों पर एक बिहारी ‘शोले’ के उस सीन पर ही सीटी बजाएगा जिसमें गब्बर हथेली पर खैनी ठोकने, फाँकने, जीभ से एकत्र कर होंठ के नीचे दबाने के बाद ‘आक थू’ करते हुए कहता है – अरे ओ संबा! कितने आदमी थे…रे…?
छात्रों के लिए यह खैनी नहीं….. बुद्धिवर्धक चूर्ण(BBC) है।
जिस तरह ENO दो मिनट में गैस से राहत दिलाता है, उसी तरह से खैनी गणित के उलझते सवालों को चुटकी में सुलझाता है। यह उन छात्रों का एकमात्र सहारा है जो रेलवे, बैंक, एसएससी आदि परीक्षाओं की तैयारी में साधनापूर्वक जगराता करते है।
“रात के 12 बज रहे हैं… पढ़ते पढ़ते झपकी आने लगी है… कोई बात नहीं…! खैनी निकालिए, रगड़ीए, थपकाइए और होंठों के नीचे दबाइए… हो गये फिर से तरोताजा!!”

खचाखच भरे पैसेंजर ट्रेन में, जहाँ ठीक से पैर रखने की जगह न हो उस स्थिति में भी ‘अखबार और खैनी’ खिड़की के बगल वाली सीट उपलब्ध कराने की गारंटी देता है।
शहर में बसेरा जमाए बाबू जब महीनों बाद अपने गाँव पधारते हैं …..तो गाँव वाले उनसे सीधे संवाद करते हैं – “का हो भिया! का हाल वा ? खियावा तनी शहरीया खैनी”…….. फिर खैनी रगड़ते हुए शुरू होता है हालचाल और बातचीत का अंतहीन सिलसिला।
खेत में काम करता किसान जब थकने लगता है तो थकान मिटाने पेड़ की छांव में आता है, खैनी बनाने के बहाने थोड़ी देर ठंडी हवाओं में सुस्ताता है, और फिर खैनी खाकर दोबारा अपने कामों में जुट जाता है….. यह खैनी उसके यांत्रिक शरीर को ऊर्जावान रखने के लिए पेट्रोल जैसा है।

थक-हार कर कोई प्रेमिका अपने प्रेमी को सिगरेट/शराब/जुआ का लत छुड़ाने के लिए जब अंतिम दांव चलते हुए कहती है कि…… या तो मुझे छोड़ो या अपने इस लत को…! तय कर लो, तुम्हें क्या करना है! …..तब वह आश्वस्त होती है कि उसका यह दांव खाली नहीं जाएगा। परंतु खैनी के मामले में वह ऐसा रिस्क लेने की भूल नहीं कर सकती ….क्योंकि उसे पता है दांव खाली ही जाएगा। वह खैनी तो छोड़ने से रहा, उलटा मुझे छोड़ जाएगा।

आर्थिक दृष्टि से खैनी सामाजिक सौहार्द को बढ़ाने का सबसे सस्ता साधन है। यह खैनी ही है जो अमीरी-गरीबी की खाई को पाटती है। जब तलब लगी हो और पास में खैनी न हो तब एक धन्ना सेठ को किसी खैनीयुक्त दरिद्र में भी नारायण दिखने लगता है। शहरों में चाय और देहातों में खैनी आतिथ्य सत्कार का औपचारिक माध्यम है। जिस तरह फेविक्विक चुटकी में चिपकाता है, उसी तरह खैनी चुटकी में दोस्ती कराता है।

इसके लत से किसी गरीब का घर-खेत नहीं बिकता, इसके लत से किसी व्यक्ति विशेष की छवि पर कोई आँच नहीं आती। किसी के विवेकहीन बकवास के जवाब में अक्सरहाँ यह सुनने को मिलता है….. “चरस लेते हो का बे? भांग खाए हो का बे? या दारू पिए हो का बे?” ……परन्तु किसी की बकलोल बातों पर ऐसा कभी सुनने को नहीं मिलता कि….. खैनी खाए हो का बे? ……इससे इसके सामाजिक सम्मान का अंदाज सहज ही लगाया जा सकता है।

लोग छप्पन भोग खाकर भलें ही तृप्त हो लें परंतु उस छप्पन भोग के बाद खैनी के तीखेपन का रस न मिले तो आत्मा की तृप्ति संभव नहीं।
कभी-कभी मैं सोचता हूँ…… यदि खैनी न होता तो पूरा बिहार केजरीवाल मोड में होता। लोगों को खाया-पिया निकालने के लिए शौचालय में घंटो धरने पर बैठना पड़ता।
खैनी की महत्ता पर प्रकाश डालना….. संभव नहीं है मेरे भाई। स्टॉप करता हूँ।

सुनें हैं कि…… बिहार में खैनी बंदी होने वाली है। हालांकि सरकार ने इससे इंकार किया है फिर भी….. हम खैनी का सेवन करने वाले स्पष्ट रूप से यह बता देना चाहते है….. इसे शराब बंदी, दहेज बंदी, बालू बंदी और लालू बंदी समझने की भूल न करे सरकार। यह अलग मैटर है….. ईंट से ईंट तो छोङिए, हम पत्थर से पत्थर बजा देंगे, थाली से थाली बजा देंगे, लोटा से लोटा बजा देंगे….. फिर क्या से क्या बजने लगेगा….. भगवान जाने!

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